शांत, विचारशील, बिना डर या अंधविश्वास के।🌘 जब डर बोलना सीखता है(हिंदी : भाग–1)ग्यारह वर्ष की उम्र मेंडर के दाँत नहीं थे।सिर्फ़ जगह थी।शाम का आमों का बाग़असल में खतरनाक नहीं था,
शांत, विचारशील, बिना डर या अंधविश्वास के।
🌘 जब डर बोलना सीखता है
(हिंदी : भाग–1)
ग्यारह वर्ष की उम्र में
डर के दाँत नहीं थे।
सिर्फ़ जगह थी।
शाम का आमों का बाग़
असल में खतरनाक नहीं था,
पर वह चुप था—
और चुप्पी
मन से अर्थ माँगती है।
इसलिए मन ने
एक नाम खोज लिया।
किचिने।
वहाँ कोई खड़ा नहीं था,
पर अनजान को
ज़्यादा देर खाली नहीं छोड़ा जा सकता।
नाम देने से
डर कुछ समय के लिए
सहने लायक हो जाता है।
इसी तरह
बचपन
रहस्य के साथ
जीना सीखता है।
समय गुजरता है।
आमों का बाग़ खो जाता है।
शरीर बड़ा होता है।
भाषा तेज़ हो जाती है।
तर्क सीख लेता है
सब कुछ समझाना।
लेकिन डर
कहीं नहीं जाता।
डर इंतज़ार करता है—
एक नए दरवाज़े का।
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