लगभग… : सुने बिना छोड़ दिए जाने की पीड़ापार्ट 2 (हिंदी विस्तार)16. बोलने से ठीक पहले का क्षणकिसी बात को कहने से पहले जो क्षण आता है,वह सबसे नाज़ुक होता है।उसमें भरोसा होता है।उसमें डर होता है।और उसमें यह उम्मीद भी—कि सामने वाला ठहरेगा।कविता की त्रासदी विदाई में नहीं,बल्कि उस lक्षण में है—जब समझ आ जाता है किकोई ठहरने वाला नहीं है।l

लगभग… : सुने बिना छोड़ दिए जाने की पीड़ा
पार्ट 2 (हिंदी विस्तार)
16. बोलने से ठीक पहले का क्षण
किसी बात को कहने से पहले जो क्षण आता है,
वह सबसे नाज़ुक होता है।
उसमें भरोसा होता है।
उसमें डर होता है।
और उसमें यह उम्मीद भी—
कि सामने वाला ठहरेगा।
कविता की त्रासदी विदाई में नहीं,
बल्कि उस क्षण में है—
जब समझ आ जाता है कि
कोई ठहरने वाला नहीं है।
17. हम बोलने से पहले क्यों रुकते हैं
मनुष्य रुकता है क्योंकि—
वह आहत नहीं करना चाहता
वह गलत समझा जाना नहीं चाहता
वह स्वयं को नंगा करने से डरता है
यह रुकना मानवीय है।
लेकिन जब इस रुकने की जगह ही नहीं दी जाती,
तो मौन विकल्प नहीं रहता—
वह मजबूरी बन जाता है।
18. साथ होकर भी अकेलापन
हर अकेलापन एकांत से नहीं आता।
कभी-कभी— एक ही मेज़ पर बैठकर,
एक ही भोजन खाते हुए,
एक ही कमरे में रहकर भी
मनुष्य अकेला हो जाता है।
यह कविता उसी आधुनिक अकेलेपन की कहानी है।
19. तेज़ होती दुनिया, धीमी भावनाएँ
आज की दुनिया तेज़ है— तेज़ फैसले,
तेज़ प्रतिक्रियाएँ,
तेज़ विदाइयाँ।
लेकिन भावनाएँ धीमी होती हैं।
यह कविता समय को धीमा करती है,
ताकि हम देख सकें
कि जल्दबाज़ी में क्या-क्या खो जाता है।
20. सुनना क्यों डराता है
सुनना केवल शब्दों को ग्रहण करना नहीं।
सुनना मतलब— बदल जाने का जोखिम।
क्योंकि सुनने के बाद
पहले जैसा नहीं रहा जा सकता।
कई लोग इसलिए नहीं सुनते—
क्योंकि वे बदलना नहीं चाहते।
21. वक्ता का मौन = आत्मसम्मान
कविता का वक्ता न तो चिल्लाता है,
न पीछा करता है।
वह जानता है— हर जगह बोली गई बात
अपनी गरिमा खो देती है।
यह मौन कमजोरी नहीं—
आत्म-संरक्षण है।
22. अधूरी शालीनता की चोट
रूखापन साफ़ होता है।
अधूरी शालीनता भ्रम पैदा करती है।
जब कोई मुस्कुराता है
लेकिन सुनता नहीं,
तो मन असमंजस में पड़ जाता है।
यही असमंजस पीड़ा को लंबा करता है।
23. अधूरे वाक्य का बोझ
जो बात कही नहीं गई,
वह समाप्त नहीं हुई।
वह लौटती है— रात में,
ख़ामोशी में,
अकेलेपन में।
यह कविता
उस अधूरे वाक्य का आश्रय है।
24. नीरव विदाई का नैतिक प्रश्न
चले जाना गलत नहीं।
लेकिन सुने बिना चले जाना
एक नैतिक प्रश्न छोड़ जाता है।
यह कविता उस प्रश्न को
ज़ोर से नहीं पूछती—
बस रख देती है।
25. यह भाग क्या कहना चाहता है
मनुष्य बोलने से पहले
केवल शब्द नहीं तैयार करता—
वह स्वयं को तैयार करता है।
सुने बिना चले जाना
उस तैयारी को नकार देना है।
यह कविता उसी नकारे गए क्षण की
शांत गवाही है।
Written with AI 

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