जब डर बोलना सीखता है(हिंदी : भाग–3 | उपसंहार)अंत मेंडर कुछ भी नहीं होता—बस एक गलत समझ।बचपन मेंजो समझ नहीं आया,उस परएक नाम रख दिया गया।
🌘 जब डर बोलना सीखता है
(हिंदी : भाग–3 | उपसंहार)
अंत में
डर कुछ भी नहीं होता—
बस एक गलत समझ।
बचपन में
जो समझ नहीं आया,
उस पर
एक नाम रख दिया गया।
वही नाम
हमारे साथ बड़ा हुआ।
बड़ा होने का अर्थ
डर से मुक्त होना नहीं,
बड़ा होने का अर्थ है
डर को समझना।
जब वर्तमान
अतीत से टकराता है,
मन एक पल के लिए
पुरानी भाषा बोलने लगता है।
उस भाषा का शब्द था—
किचिने।
आज उस शब्द की
ज़रूरत नहीं रही।
क्योंकि अंजाना
अब अंजाना नहीं रहा।
खामोशी
अब खाली नहीं लगती।
रोशनी
अब सवाल नहीं बनती।
डर तब
कोई साया नहीं,
कोई कल्पना नहीं—
डर बन जाता है
ख़ुद को समझने की
पहली सीढ़ी।
और जब
डर बोलना सीखता है,
तब वह
डर नहीं रहता।
वह बन जाता है—
समझ।
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