हिंदी ब्लॉग – भाग 4 (एक ही प्रवाह में)मौन की भी अपनी गरिमा होती है, जिसे समाज अक्सर पहचान नहीं पाता। गरिमा का अर्थ हमेशा ऊँची आवाज़ में बोलना या स्वयं को सामने रखना नहीं होता। कई बार चुप रहना ही यह स्पष्ट कर देता है कि व्यक्ति अपनी सीमाओं और मूल्यों को जानता है। ख़ामोश व्यक्ति अनावश्यक शब्दों से बचता है, क्योंकि वह जानता है कि हर शब्द सत्य को नहीं बढ़ाता।मौन और आत्मसम्मान का गहरा संबंध है। जिसे स्वयं को साबित करने की मजबूरी नहीं होती, वह बार-बार बोलने की ज़रूरत नहीं महसूस करता। बाहर से यह अहंकार लग सकता है, लेकिन भीतर यह स्थिरता होती है। यह स्थिरता व्यक्ति को भीड़ में

🟦 हिंदी ब्लॉग – भाग 4 (एक ही प्रवाह में)
मौन की भी अपनी गरिमा होती है, जिसे समाज अक्सर पहचान नहीं पाता। गरिमा का अर्थ हमेशा ऊँची आवाज़ में बोलना या स्वयं को सामने रखना नहीं होता। कई बार चुप रहना ही यह स्पष्ट कर देता है कि व्यक्ति अपनी सीमाओं और मूल्यों को जानता है। ख़ामोश व्यक्ति अनावश्यक शब्दों से बचता है, क्योंकि वह जानता है कि हर शब्द सत्य को नहीं बढ़ाता।
मौन और आत्मसम्मान का गहरा संबंध है। जिसे स्वयं को साबित करने की मजबूरी नहीं होती, वह बार-बार बोलने की ज़रूरत नहीं महसूस करता। बाहर से यह अहंकार लग सकता है, लेकिन भीतर यह स्थिरता होती है। यह स्थिरता व्यक्ति को भीड़ में भी अकेला नहीं पड़ने देती।
समाज की मानसिक सेहत इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कितने लोग बोल रहे हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि कितने लोग सुनना जानते हैं। दुर्भाग्य से हम सुनने से पहले जवाब देने की तैयारी करते हैं। ख़ामोश व्यक्ति सुनता है—पूरी तरह, बिना जल्दबाज़ी के। यह क्षमता समाज के लिए अनमोल है, पर अक्सर अदृश्य रहती है।
जब मौन का सम्मान नहीं होता, तो लोग अभिनय करने लगते हैं। वे हँसते हैं जब मन नहीं होता, बोलते हैं जब कहने को कुछ नहीं होता। यह अभिनय धीरे-धीरे मानसिक थकान पैदा करता है। ख़ामोश व्यक्ति इस थकान से बचने के लिए मौन चुनता है। यह आराम नहीं, बल्कि संरक्षण है।
मौन के माध्यम से उपचार होता है। हर पीड़ा रोती नहीं; कुछ पीड़ाएँ चुपचाप बैठी रहती हैं। यदि इस मौन को जगह मिले, तो व्यक्ति स्वयं को जोड़ सकता है। लेकिन जब समाज इसे समस्या मान लेता है, तो घाव और गहरे हो जाते हैं।
ख़ामोश व्यक्ति समाज से भागता नहीं है। वह केवल समाज की शर्तों पर खुद को नहीं ढालता। वह अपनी गति से चलता है। आज के तेज़ समय में यह धीमापन एक क्रांतिकारी कदम है।
कमरे का कोना अब प्रतीक बन जाता है। यह छिपने की जगह नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण की जगह है। यहाँ व्यक्ति बिना स्पष्टीकरण के मौजूद रह सकता है। यही मौन की सच्ची आज़ादी है।
यदि समाज मौन को स्वीकार करना सीख ले, तो कई गलतफ़हमियाँ समाप्त हो सकती हैं। चुप रहना तब पागलपन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का एक रूप माना जाएगा।
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