जो स्वर मुझे बुलाए, जो आवाज़ मुझे रोक देअज्ञात से साक्षात्कार की गहराती परछाइयाँब्लॉग – भाग 8स्मृति: सबसे शांत भूतकुछ भूत शोर नहीं करते।वे स्मृति बन जाते हैं।पायल की आवाज़ अब सुनाई नहीं देती,पर उसकी आकृति मन के भीतर चलती रहती है—धीमी, लगभग अदृश्य।स्मृति समय से नहीं डरती।वह लौटती है तब,जब हम सबसे कम तैयार होते हैं।और हर बार लौटकरवह वही प्रश्न रख देती है—अगर उस रात मैं आगे बढ़ जाता तो?कल्पना और पछतावे की पतली रेखाकल्पना हमें बचाती भी है

जो स्वर मुझे बुलाए, जो आवाज़ मुझे रोक दे
अज्ञात से साक्षात्कार की गहराती परछाइयाँ
ब्लॉग – भाग 8
स्मृति: सबसे शांत भूत
कुछ भूत शोर नहीं करते।
वे स्मृति बन जाते हैं।
पायल की आवाज़ अब सुनाई नहीं देती,
पर उसकी आकृति मन के भीतर चलती रहती है—
धीमी, लगभग अदृश्य।
स्मृति समय से नहीं डरती।
वह लौटती है तब,
जब हम सबसे कम तैयार होते हैं।
और हर बार लौटकर
वह वही प्रश्न रख देती है—
अगर उस रात मैं आगे बढ़ जाता तो?
कल्पना और पछतावे की पतली रेखा
कल्पना हमें बचाती भी है
और उलझाती भी।
वह कहती है—
शायद तुम कुछ खो बैठे।
वह यह भी कहती है—
शायद तुम बच गए।
यही दुविधा स्मृति को जीवित रखती है।
अगर सब कुछ स्पष्ट होता,
तो कुछ भी भूतिया नहीं बचता।
ब्लॉग – भाग 9
संयम: अदृश्य नायक
हम अक्सर साहस की कहानियाँ सुनते हैं।
कम ही सुनते हैं संयम की कथाएँ।
संयम दिखता नहीं।
वह मंच नहीं माँगता।
उस रात मेरा संयम
किसी को दिखाई नहीं दिया—
पर उसी ने मुझे सुरक्षित रखा।
संयम वह शक्ति है
जो शोर नहीं करती,
पर दिशा बदल देती है।
आकर्षण बनाम चेतना
आकर्षण कहता है—
अभी चलो।
चेतना कहती है—
पहले समझो।
दोनों के बीच संघर्ष
हमेशा शांत नहीं होता।
कभी-कभी वह
पूरी रात चलता है।
और सुबह तक
हम बदल चुके होते हैं।
ब्लॉग – भाग 10
डर का पुनर्पाठ
डर हमेशा नकारात्मक नहीं।
कुछ डर संरक्षक होते हैं।
वे हमें बाँधते नहीं—
वे हमें सीमाएँ दिखाते हैं।
तुम्हारी आवाज़ ने
मेरे भीतर ऐसा ही डर जगाया।
वह डर नहीं कह रहा था—
भागो।
वह कह रहा था—
ठहरो।
अंतिम उत्तर (जो पूर्ण नहीं है)
आज भी,
यदि कोई पूछे—
वह कौन थी?
मैं उत्तर नहीं देता।
क्योंकि अब समझ आ गया है—
हर प्रश्न का उत्तर देना ज़रूरी नहीं।
कुछ प्रश्न
हमें जाग्रत रखने के लिए होते हैं।
उपसंहार की ओर
यह कहानी
न डर की है,
न प्रेम की।
यह कहानी
जागरूक होने की है।
जहाँ स्वर आकर्षण था,
और आवाज़ चेतावनी।
और उनके बीच
मैं था—
सीखता हुआ।
अंतिम अस्वीकरण (Final Disclaimer)
यह रचना साहित्यिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक रूपक है।
भूतिया वातावरण मानवीय चेतना, स्मृति और चयन का प्रतीक है।
इसका उद्देश्य भय नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता है।
🌑 written with AI 

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