हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं🌑 कवितामुझे मत रुला तेरी आँखों से,हम तो ज़िंदा हैं अपनी प्यासों से।अगर तेरी दया ही सहारा होती,तो कब के डूब गए होते।हमने सूखे से जीना सीखा है,बिना बादल के भी जलना सीखा है।तेरे आँसू उधार की राहत हैं,हमें दर्द से चलना आता है।तू पूछता है—इतने अकेले कैसे खड़े हो?मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ—
हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं
🌑 कविता
मुझे मत रुला तेरी आँखों से,
हम तो ज़िंदा हैं अपनी प्यासों से।
अगर तेरी दया ही सहारा होती,
तो कब के डूब गए होते।
हमने सूखे से जीना सीखा है,
बिना बादल के भी जलना सीखा है।
तेरे आँसू उधार की राहत हैं,
हमें दर्द से चलना आता है।
तू पूछता है—
इतने अकेले कैसे खड़े हो?
मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ—
जहाँ स्वाभिमान ज़िंदा हो,
वहाँ अकेलापन हार जाता है।
🧠 कविता का विश्लेषण
यह कविता रोने के विरुद्ध नहीं है,
यह दया के नाम पर कमज़ोर बनाए जाने के विरुद्ध है।
कवि कहता है—
हर आँसू सुकून नहीं देता,
कुछ आँसू इंसान को
अपनी ही नज़रों में छोटा कर देते हैं।
“अपनी प्यास से ज़िंदा रहना”
का अर्थ है—
बिना सहारे जीना
बिना शिकायत बढ़ना
और बिना दिखावे मज़बूत होना
यह कविता उन लोगों की आवाज़ है
जो टूटे ज़रूर,
पर गिरे नहीं।
📘 दर्शन (Philosophy)
1️⃣ स्वाभिमान बनाम करुणा
करुणा ऊपर से आती है,
स्वाभिमान भीतर से।
कवि करुणा को ठुकरा नहीं रहा,
वह उस करुणा को ठुकरा रहा है
जो इंसान को निर्भर बना दे।
2️⃣ दर्द: सज़ा नहीं, शिक्षा
यह कविता दर्द को महिमामंडित नहीं करती,
लेकिन यह मानती है कि
दर्द ने इंसान को गढ़ा है।
दर्द यहाँ—
शिक्षक है
परीक्षा है
और चरित्र की आग है
3️⃣ रेगिस्तान का प्रतीक
रेगिस्तान दर्शाता है—
भावनात्मक कमी
सहारे की अनुपस्थिति
अकेले चलने की मजबूरी
लेकिन रेगिस्तान ही सिखाता है—
कम में कैसे जिया जाए।
🌱 भावार्थ (Essence)
यह कविता कहती है—
“मुझे बचाने मत आओ,
मैंने जीना सीख लिया है।”
यह न घमंड है,
न नफ़रत।
यह शांत आत्मसम्मान है।
Written with AI
Comments
Post a Comment