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हम अपनी ही प्यास से ज़िंदा हैं
मुझे मत रुला—
तेरी आँखों से नहीं…
वे आँसू मेरे ज़ख़्मों के लिए
बहुत भारी हैं।
मैं इसलिए नहीं रोता
कि मुझे दर्द नहीं होता,
मैं इसलिए नहीं रोता
क्योंकि मैंने जीना सीख लिया है।
जो आदमी
अँधेरे में
खुद को उठाकर खड़ा करता है,
उसे फिर
किसी कंधे की आदत नहीं रहती।
मुझ पर दया मत करना—
दया कई बार
इंसान को
उसकी ही नज़रों में छोटा कर देती है।
मुझे करुणा नहीं चाहिए,
मुझे सम्मान चाहिए।
मैं रेगिस्तान से आया हूँ—
जानता हूँ
बादल न हों
तो भी प्यास से सौदा कैसे किया जाता है।
मेरी प्यास ने
मुझे तोड़ा भी है,
और वही प्यास
मुझे आज तक
ज़िंदा भी रखे हुए है।
तुम पूछते हो—
“इतने अकेले रहकर
कैसे साँस लेते हो?”
मैं हल्की मुस्कान के साथ कहता हूँ—
जिस दिन
खुद को खो देने का डर चला जाए,
उस दिन
अकेलापन भी
डराना छोड़ देता है।
मैं प्यार करता हूँ,
पर सहारे पर नहीं जीता।
मैं महसूस करता हूँ,
पर खुद को बेचता नहीं।
क्योंकि मैंने सीख लिया है—
हर आँसू मुक्ति नहीं देता,
कुछ आँसू
आदमी को उधार में ज़िंदा रखते हैं।
और मैं…
उधार में नहीं जीता।
मैं जीता हूँ—
अपनी ही प्यास से।
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